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उत्तर प्रदेश के जनपद फतेहपुर में स्थित बाल कल्याण समिति के पास कागज और पेन खरीदने के पैसे नहीं है

 यूपी सरकार दावे तो बड़े बड़े करती है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है आपको बता दें कि फतेहपुर जनपद की बाल कल्याण समिति के पास कागज पेन खरीदने के पैसे नहीं हैं।



बाल कल्याण समिति का गठन उत्तर प्रदेश सरकार करती है जिसमें एक अध्यक्ष 4 सदस्य 4 सदस्यों में एक महिला का होना अनिवार्य है। 

बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष एक सिटी मजिस्ट्रेट की हैसियत रखता है बालकल्याण समिति के आदेश से बच्चे अपने अभिभावकों से मिलते हैं यानी ये एक सरकारी संस्था है जो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (बाल सरक्षन अधिनियम को प्रभावी बनाने के लिए राज्य सरकार ने इसका गठन किया है 

अब आते हैं मूल खबर पर दरअसल हुआ ये की फतेहपुर जनपद के थाना जाफरगंज ग्राम हबीबपुर निवासी हफीज खान पर ये आरोप था की वो अपने पोते उमर खान पुत्र अकरम खान को जो अभी 7 वर्ष का है उससे बकरियां चरवाता है स्कूल नहीं भेजता अगर बच्चा बकरियां चराने न जाए तो उसे बुरी तरह पीटता है दरअसल बच्चे की मां का देहांत हो गया है और हबीबपुर निवासी हफीज खान अपने दामाद से 5 लाख रु की वसूली करने के लिए अपने पोते को जबरन अपने पास रखा हुआ है उससे बकरियां चरवाता मारता पीटता है

बाल कल्याण समिति फतेहपुर यूपी 


जनसुनवाई पोर्टल के तहत इसकी सूचना थाना जाफरगंज को दी गई थाना प्रभारी जाफरगंज ने आरोपी से रिश्वत लेकर झूठी आख्या बनाई और अपने इस झूठ में बाल कल्याण समिति को भी सामिल किया 

थाना जाफरगंज के थाना प्रभारी बालकलयान समिति जनपद फतेहपुर को एक प्रार्थना पत्र लिखते हैं की हमने बच्चे का बयान ले लिया है और बच्चे ने शिकायत को निराधार बताया है इस लिए मैं आग्रह करता हूं की बच्चे को कस्टडी बच्चे के नाना को दी जाए 

बाल कल्याण समिति ने उसी प्रार्थना पत्र में जो थाना जाफरगंज के पुलिस अधिकारियों ने दिया था नीचे की तरफ अपना आदेश अंकित करते हैं और मुहर लगा देते हैं प्रार्थना पत्र नीचे की ओर के बाएं तरफ बाल कल्याण समिति का आदेश और मुहर है और प्रार्थन पत्र के दाई ओर थाना जाफरगंज की मुहर और हस्ताक्षर हैं प्रार्थना पत्र सलग्न है 

राउंड के अंदर वाला मुहर और आदेश बाल कल्याण समिति का है और तीर के निशान की ओर वाला जाफरगंज थाना का है और प्रार्थना पत्र भी पुलिस द्वारा दिया गया है।

मतलब समिति के पास आदेश पारित करने के लिए कोई फॉर्मेट नहीं है और उसमें इतनी भी ताकत नहीं है की वो अपने लिए कोई कागज खरीद लाए मजबूरन उसे पुलिस थाना द्वारा लाए गए प्रार्थना पत्र या किसी एनजीओ द्वारा लाए गए प्रार्थना पत्र का उपयोग करते हैं उसी में अपना आदेश पारित कर देते हैं


और तो और वो बच्चे  का बयान भी नहीं लेते बच्चे का मनोचिकित्सक द्वारा काउंसलिंग भी नहीं करवाते हैं डायरेक्ट पुलिस के आदेश से आदेश पारित करते हैं।

ऐसा है यूपी के बालकों को सरक्षणा देने वाला इंस्टीट्यूट
ऐसे में यूपी सरकार को चाहिए बाल संरक्षण अधिनियम को प्रभावी बनाने का मजाक बंद कर देना चाहिए



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